सनातन क्या है?
सनातन केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवन-पद्धति है जिसका कोई आरंभ नहीं और कोई अंत नहीं। इसका अर्थ है वह जो हमेशा से है, आज भी है और आगे भी रहेगा। समय बदलता है, समाज बदलता है, पर सनातन के मूल सिद्धांत नहीं बदलते। इसलिए इसे सनातन धर्म कहा जाता है — अर्थात शाश्वत सत्य और प्रकृति के नियमों पर आधारित जीवन का मार्ग।
सनातन किसी एक किताब, एक व्यक्ति या एक समय की देन नहीं है। यह हजारों वर्षों से विकसित होती हुई वह गहरी समझ है जो हमारे पूर्वजों ने अपने अनुभव, बुद्धि, प्रकृति और मानव मन की गहराई से प्राप्त की। वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत – ये सब सनातन के विविध स्वरूप हैं, लेकिन सनातन केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं। यह प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने की कला है।

सनातन यह सिखाता है कि हर जीव, हर पेड़, हर नदी, हर पर्वत और सम्पूर्ण सृष्टि एक ही चेतना का विस्तार है। इसी कारण इसमें किसी भी अस्तित्व का अनादर नहीं किया जाता। पूजा का अर्थ केवल ईश्वर को फूल चढ़ाना नहीं, बल्कि स्वयं को शांत, संतुलित और सच्चा बनाना है।
सनातन का केंद्रीय विचार है कि सत्य एक है, लेकिन उसे पाने के मार्ग अनेक हो सकते हैं। इसलिए यहाँ किसी पर अपनी मान्यता थोपने की आवश्यकता नहीं मानी जाती। यह मनुष्य को प्रेरित करता है कि वह पहले अपने भीतर के अंधकार को दूर करे और फिर संसार में प्रकाश फैलाए। योग, ध्यान, आयुर्वेद, करुणा, धर्म, परोपकार—ये सभी सनातन की ही देन हैं।
सनातन धर्म एक निरंतर प्रवाह है। जैसे नदी अपने मार्ग में अनेक मोड़ लेती है लेकिन बहना नहीं छोड़ती, वैसे ही यह ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहता है। यह मनुष्य को स्वतंत्र सोचने, प्रश्न पूछने और सत्य की खोज करने की स्वतंत्रता देता है। इसीलिए इसे धर्म से अधिक एक जीवन-दर्शन कहा जाता है।
संक्षेप में,
सनातन वह है जो मानव को सत्य, नैतिकता, करुणा, संतुलन, आत्मज्ञान और प्रकृति के सम्मान का मार्ग दिखाता है।
यह किसी एक समुदाय का नहीं बल्कि पूरी मानवता का ज्ञान-स्रोत है — एक ऐसा मार्ग जो हर युग में मनुष्य को भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर प्रकाश की ओर ले जाता है।
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